Wednesday, July 8, 2009
मैं भीगा फ़िर भी....आँखों में पानी कम न था.
इस बार बादलों में कैसी साजिश हुई
मेरा घर छोड़ पूरे शहर में बारिश हुई।(ये किसी और की हैं)
मैं भीगा फ़िर भी
भले बादलों में षडयंत्र था
मेरे पास गम बहुत थे
और आँखों में पानी कम न था।
मैं रोया था
ये अल्फाज़ ठीक नही
वो आंसू नही थे
क्योंकि उसका उन्हें अहसास न था। ।
Monday, July 6, 2009
सामाजिक मान्यता के लिए बच्चे गोद लेंगे...
कल को खुलेआम लोग सेक्स करने लगेंगे तो ये कहेंगे इसमे किसी का क्या नुक्सान इसे अश्लीलता के दायरे से हटाया जाए। क्या ये मान्य होगा? हमारा देश मर्यादा पुरषोत्तम को पूजता है। आखिर मर्यादा भी तो कुछ है।
परिवारवाद को नष्ट करने की शुरुआत है ये homosexual sanskriti पर होमोसेक्सुअल संस्कृति के पक्षधर का कहना है कि हम बच्चे गोद लेंगे। आज समाज को दिखने के लिए ये गोद तो लेंगे पर उसे माँ बाप दोनों का प्यार मिल पायेगा? एक तो समाज इनको अपना नही पाया है तो सोचिये उस बच्चे को क्या झेलना पड़ेगा जिसे ये अपना नाम देंगे। क्या सीखेगा वो? इनके रिश्ते ख़ुद कितने दिन चल पाते हैं ये भी सोचने लायक है। फिर क्या होगा उस बच्चे का?
न जाने कैसे उदाहरण दे डाले इन लोगो ने धार्मिक मान्यता पाने के लिए कि सुनकर हसी आ गई। कहा गया कि भगवान् श्रीकृष्ण भी तो अर्धनारेश्वर थे। शिखंडी का उदहारण दिया गया। अब कौन समझाए इन लोगो कि भाई/बहनों कि इसका अर्थ ये नही कि वो होमोसेक्सुअल थे। पहली बार मैंने सभी धर्मो को एक जुट देखा। उन्हें भी इस मुद्दे पर धर्म का ठेकेदार कहकर न जाने क्या साबित करने पर लगे थे। खैर मेरे हिसाब से तो ये ग़लत है और एक सामाजिक बीमारी है। अपने देश की संस्कृति और मानव समाज के लिए होमोसेक्सुअल संस्कृति को मान्यता देने ग़लत होगा।
Saturday, July 4, 2009
पॉर्न साईट बैन- ग़लत या एक अच्छी शुरुआत
सविता भाभी एक जाना माना नाम। ये हाल में चर्चा में आया इससे पहले मैं इस नाम से वाकिफ नही था। ये बताने की ज़रूरत नही की ये एक पॉर्न कार्टून कॉमिक चरित्र है।
कभी कभी मीडिया कुछ ऐसी गलतिया कर जाती है की क्या कहा जाए जो साईट अभी तक काफ़ी लोगो ने देखी नही थी पर अब घर में बच्चे भी इस नाम वाकिफ है और सवाल पूछ रहे है कि ये कौन है? ये तो ज़ाहिर है कई लोगों के मन में इस साईट को ओपन करने की इच्छा हो रही होगी। एक tarike से इसे और prasiddhi मिल गई।
कुछ लोग इस साईट को बैन करने पर आपत्ति जता रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि साईट को बंद करने से क्या और भी साईट हैं वो बैन नही हुई तो ये क्यों? ये कौन लोग हैं क्या उनमे इतनी हिम्मत है कि अपने परिवार के साथ आ कर अपने माता पिता के सामने साईट के पक्ष में बात कर सकते हैं। नही कर सकते।
इस बैन पर मेरा ये सोचना है कि चलो ऐसी साइट्स के बैन होने कि शुरुआत तो हुई। क्या आप भी मेरे इस नज़रिए से सहमत हैं?
Friday, July 3, 2009
सामाजिक बीमारी है समलैंगिकता
टोड ने एक साँप को खा लिया वो भी वाइपर जाति के जो ज़हरीली होती है। लोस एंजेलिस के निक फोकोमेलिया बीमारी से ग्रसित हैं फ़िर भी तैरते हैं, गोल्फ खेलते हैं, फुटबॉल खेलते हैं। ये दो खबरें अजीब हैं और अच्छी भी। पर एक और अजीब ख़बर है मेरे हिसाब से जो अच्छी नही और उस पर ही कुछ विचार उमड़ रहे हैं....भारत में धारा ३७७ पर दिल्ली हाई कोर्ट के अजीब फैसले ने जो देश में अफरा तफरी का माहौल पैदा किया है। उस पर बहसों का सिलसिला शुरू हो चुका है। छोटे से कमरे से लेकर इसकी गूँज हर तरफ़ सुनाई देगी ।
मैं इस फैसले से सहमत नही। मेडिकल एक्सपर्ट ने कहा की समलैंगिकता कोई मानसिक विकार या किसी बीमारी का परिणाम नही। पर इसका अर्थ ये नही की ये सही। अप्रकर्तिक सम्बन्ध शरीर को नुक्सान तो पहुंचाते हैं साथ ही परिवार वाद और मनुष्य जाति पर खतरा है। आखिर क्या वजह है की लोग समलैंगिक हो रहे हैं? लड़कियों के बीच अधिक रहने वाले लड़को में उन जैसी हरकतें करने की आदत और फ़िर लड़कियों में उनके प्रति लड़को वाला आकर्षण नही रह जाता । और ऐसे लड़के passive गे बन जाते हैं। दूसरी तरफ़ Active गे बन ने में पश्चिमी संस्कृति जिम्मेदार है। जिन देशो या एरिया में लड़कियां कम कपडों में रहती हैं वहां लड़कों में उनके प्रति वो आकर्षण नही रह जाता । ये कुछ ऐसा ही है कोई पसंदीदा चीज़ मिल जाने के बाद उसके प्रति मोह नही रह जाता । इसलिए उन देशों में खास तौर से जो इस्लामिक हैं और परदा प्रथा है वहां गे कम ही देखने को मिलेंगे।
लड़कियों के lesbian बन ने की वजह में टीवी और इन्टरनेट एक बड़ा कारक है.साथ ही उनका एक दूसरे के साथ अधिक रहने वाली लड़कियों में, पॉर्न साइट्स , ब्लू फ़िल्म आदि देखने वाली लड़कियों में ये प्रॉब्लम पैदा होती है। इसीलिए गर्ल्स hostel में लड़कियां इन बातों में ज़्यादा शामिल होती हैं न की घर में परिवार के साथ रहने वाली। पर एक मुख्य वजह और है उस काम को करने की इच्छा जो ग़लत है।
सम्लैंगिकिता अपने मन पर कंट्रोल न रखने वाली मानसिक विकृति से उत्पन्न एक सामाजिक बीमारी है।
ज़रूरी नही जो कानूनन सही हो और एक समूह उसका समर्थक हो वो हमेशा सही हो। संस्कृति अभाव में मेट्रो शहरों में अपनापन न होना , बडो की इज्ज़त न करना , कम उम्र में sex और उसके MMS, नशा और न जाने क्या क्या हो रहा । इनमे से कुछ कानूनन ग़लत नही हैं पर इनपर अफ़सोस तो सभी को होता है।
Wednesday, July 1, 2009
डाक्टर्स डे पर डाक्टर्स ने मनाया जोक डे
मैंने टीवी पर शो में जज को जनता को ये संदेश देते सुना है कि किसी एक परफॉर्मेंस के आधार पर वोट न करे। मैं भी इसी विचार धारा का इन्सान हूँ। इसी विचार धारा के साथ मैं कुछ पुरानी ख़बरों को याद कर रहा हूँ जैसे अस्पताल के बाहर पैसे के आभाव में लोगो का मरना आदि आदि। और आज ही अख़बार में ख़बर है कि तीन साल पहले नसबंदी करा चुकी महिला गर्भवती हो गई। लोगो के अंग कि तस्करी करने वाले डाक्टर्स कि खबरें तो आपको भी याद होगी। महिला मरीजों से छेड़खानी करने वाले डाक्टर्स इन सब खबरों को याद कर आप भी अब शायद अपने विचारो में हर डाक्टर को भगवान नही मानेगे। डायग्नोस्टिक सेण्टर से कमीशन खाना और जिसका बोझ हर अमीर गरीब पर पड़ता है और हर जांच दोगुनी चौगुनी हो जाती है। दवाइयों में कमीशन खाना न जाने क्या क्या....
खैर आज एक इंटरनेशनल जोक डे भी है.... और डाक्टर्स डे पर डाक्टर्स के वादे भी अब जोक लग रह हैं। लगता है डाक्टर डाक्टर्स डे कि जगह जोक डे मना रहे हैं।
Saturday, June 13, 2009
इंडियन रेलवे-ट्रेन के शाहरुख़-रेलवे मिनिस्टर
जी नही। उत्तर प्रदेश और बिहार में कुछ अलग सीन होता। शायद कुछ ऐसा शुरुआत में ट्रेन निकलती देख न काजोल भागती और न शाहरुख़ हाथ निकलकर पकड़ता क्योंकि या तो ड्राईवर चला कर २०० मीटर चलने के बाद ट्रेन रोक खड़ा हो जाता(मैंने अक्सर इस हालत को झेला है ) या शाहरुख़ वैक्यूम (ये शब्द मैंने ट्रेन में सुना है) लगा कर आराम से १० मिनट के लिए ट्रेन रोक लेता। आखिरी सीन में भी कुछ ऐसा ही होता।
ये सीन सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क देश के २ बड़े राज्यों की दास्ताँ है हो सकता है कुछ और में भी हो पर मैंने दूसरी जगह इसे झेला नही है। ट्रेन आती है लेट, चलती है लेट, चलकर रूकती है फिर लेट होती है। जगह जगह लोग अपना घर पास आते ही ट्रेन रोक लेते हैं ऐसा पहले बस में होता था कि मोहल्ला या गाँव पास आया तो बस रोक ली स्टेशन तक कौन जाए एक ही शहर में १०-२० जगह लोग बस रोकते थे। अब ट्रेन में भी ये हो रहा है। आखिरी में तो और मज़ा आता है जब ट्रेन स्टेशन के नज़दीक पहुच जाती है तो आउटर पर खड़ी हो जाती है। न तो उतरते बनता है kyoki ख़ुद को सभ्य नागरिक दिखाना पड़ता है और जब आखिरी में सभ्यता टूटने लगती है तो आउटर पर रेल पटरियों पर सुबह सुबह लोगों की नित्य क्रिया और उसके बाद का माहौल उतरने नही देता। ये हाल तब है जब रेल मिनिस्टर कम से कम बातों में ही दिल्ली में मंत्रालय में समय देते थे अब न जाने क्या होगा जब रेल मिनिस्टर ने कहा कि वो ज़्यादा समय पश्चिम बंगाल में रहेंगी। एक गुजारिश है कोई इस लेख को उन्हें न सुनाये नही तो मैडम का गुस्सा तो आप लोग जानते ही होंगे .........
Saturday, May 23, 2009
तेरा साथ.......मेरी ज़िन्दगी...
ये मानता हूँ
मेरी ज़िन्दगी के लिए
तेरा साथ ज़रूरी है
पर क्या तेरे निगाह में
मेरा जिंदा रहना
इतना ही ज़रूरी है?
