बचपन मासूम होता है, वो हारना नही चाहता । वो जब हारता है तो दुखी होता है। और जब उसे हार का डर दिखाया जाता है तो उन पलों में उस पर जो गुज़रता है वो दर्द कोई बड़ा बचपन में जाकर ही सीख सकता है। पर टीवी सीरियल वाले अपने फायदे के लिए इस बचपन को बेच भी रहे हैं और उसके चेहरे के डर का प्रयोग भी कर रहे हैं। टीवी पर होने वाली हँसी आदि वाले प्रोग्राम्स में रिजल्ट को घोषित करने से पहले दर्शकों का उसमे इंटेरेस्ट बढ़ाने के लिए अजीब सा माहौल पैदा किया जाता है पर उन पलों में जो प्रतिभागी बच्चे होते हैं उन के चेहरे पर एक अजीब सी चिंता आ जाती है जिसे कई बार दिखाया जाता है। कल के ही एक ऐसे प्रोग्राम में एक छोटा बच्चा रिजल्ट आने से पहले ही रोने लगा। उसका वो डरा हुआ चेहरा मुझे अभी तक याद आ रहा है।
इन प्रोग्राम्स में बच्चों की मासूमियत भी मर रही है। जीतने के लिए बच्चों को फूहड़ चुटकले, हरकतें करते देख अजीब सा लगा इतना तो तय था की ये उनकी सोच नही है उन्हें सिखाया गया है। जोकि उन बच्चों के पैरेंट्स आदि के लिए शर्मनाक है। और यदि ये बच्चों की सोच है तो भी अभिवावकों की भूमिका ही ग़लत मानी जायेगी। मेरा अनुरोध है की इन मासूमों के बचपन को बाज़ार के किसी उत्पाद की तरक्की के लिए इस तरह बरबाद न करें और ऐसे प्रोग्राम की भर्त्सना करें।
काव्यनीति
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वेदना की शब्दवीथी न मेरी है ये काव्यनीति
है शशंकित मन जो तेरा उबार लूँ मैं यही प्रीती
राह पर नेपथ्य के चलना कठिन बस आज भर
कौन जाने क्या है आगे भविष्य तो बस...
9 years ago